मैं बहता पानी हूँ मुझे कैद न करो सड़ जाउँगी। साँस घुटती है खोलो ये पिंजरे मर जाऊँगी। रोक लो हया आँख में अपनी मैं ठहर जाऊँगी। छीलती हैं नज़रें बच के इनसे किधर जाऊँगी? न साथ खींचो मुझसे अपना बिखर जाऊँगी। औरत ही हूँ न इंसान का दर्ज़ा आख़िर कब पाऊँगी? ****