आईना टूटा है,

फिर शक्ल तो बिखरी दिखेगी।

है अगर बदलाव की फिर

रात तो गहरी दिखेगी।।


है ठिठुरती मानता हूं,

दुःख तेरे पहचानता हूं।

हो गए हो राख फिर भी,

जल रहे हो जानता हूं ।।


थकते कदम को थामने का,

अब प्रयत्न तेरा व्यर्थ ही है।


जब पास होगे मंजिलों के,

फिर सांस तो भरती दिखेगी।।


है अगर बदलाव की,

फिर रात तो गहरी दिखेगी।।