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हाँ मैं मैदान में हूं !

मैदानों को ये दिन प्रतिदिन में आभास कराता

इक राह सुगम बेशक धीरे-धीरे में आज बनाता 

मिट्टी वैसी सजी नहीं कुछ उथल पुथल उफान में हूं

तनिक धीरे ही सही पर हाँ मैं मैदान में हूं ! 


कुछ ने कहा लौट जाओ हां मैं भी उन्हें क्या बताता

यह पालक की खेती नहीं हाँ मैं क्युं गाजर का आभास दिलाता

शांति है बाहर कितनी पर अंदर इक तूफान में हूं

तनिक धीरे ही सही पर हाँ मैं मैदान में हूं ! 


खेल देखने वालों को नहीं पर मैदां को मैं हर रोज दिखाता

मालिक दिया नहीं जुगनू हूँ रात में ऐसे कैसे बुझा जाता

खूब हार हारा हूं मगर मन की कुटिया के विजय विमान में हूं

तनिक धीरे ही सही पर हाँ मैं मैदान में हूं !


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