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क़ैद ​होकर भी निग़ाहों में

क़ैद ​होकर भी निग़ाहों में, क़ैद ​होकर भी निग़ाहों में , तू आज़ाद रहता है...! ग़म-ए-इश्क़ पाकर भी , तू आबाद रहता है…!! जश्न-ए-महफ़िल में भी , तुझे अवसाद रहता है ..! टूटा दिल , तू नही टूटा , भला कैसे बनके फौलाद रहता है…!! न करना इश्क़ तू अब से , इसमें विवाद रहता है..! काबिल से काबिल बंदा भी
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