क़ैद ​होकर भी निग़ाहों में, क़ैद ​होकर भी निग़ाहों में , तू आज़ाद रहता है...! ग़म-ए-इश्क़ पाकर भी , तू आबाद रहता है…!! जश्न-ए-महफ़िल में भी , तुझे अवसाद रहता है ..! टूटा दिल , तू नही टूटा , भला कैसे बनके फौलाद रहता है…!! न करना इश्क़ तू अब से , इसमें विवाद रहता है..! काबिल से काबिल बंदा भी , इश्क़ में बरबाद रहता है …!! प्रिय हैं श्री राम , वो क्षेत्र जहाँ राम नाम का उन्माद रहता है ..! कि बाशिंदे-दून होकर भी , दिल तेरा फैज़ाबाद रहता है...!! ये बता "नीरज" कि भीड़ में रहकर भी , तू कैसे अपवाद रहता है ..! ग़म-ए-इश्क़ पाकर भी , तू भला कैसे आबाद रहता है……! भला कैसे आबाद रहता है…!!