इक तेरा ही ग़म तो नहीं जमाने में
कितने ही ग़म दफ़्न दिल के तहख़ाने में
दर्द और इश्क़ का ये रिश्ता कैसा है
फिर तेरी ही बात छिड़ी अनजाने में
आख़िर क्या कीमत तय करूँ मुहब्बत की
ख़ुद को ही खोया है तुझ को पाने में
नजरों से ही बयां हो जाती है मुहब्बत
हमें इक उम्र लगी उसे बताने में
जिससे मांगा था मैंने उम्रभर का साथ
उसने तो जुदाई दी है नजराने में
तेरे संग कितनी खुशरंग थी ये दुनिया
अब दिल नहीं लगता कहीं आने जाने में
शराब,शबाब,अदा, वफ़ा,महक नशा और
क्या कुछ नहीं था आँखों के महखाने में
ये सर फिर सज़दे में कभी झुका ही नहीं
है ये मुहब्बत ख़ुदा मेरे अफ़साने में
©नीरज


