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देश चलाते बायदे

Neeraj sharmaNeeraj sharma January 16, 2022
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      देश चलाते बायदे
         (नीरज शर्मा)

पिछले दिनों मैंने एक व्यंग लि जो की बहुत संक्षेप एवं चन्द पंक्तियों का था परन्तु वो वयंग हमारे देश के प्रधान सेवक के साथ घटी एक घटना का जाने अंजाने  हु-ब-हु चित्रण पेश करता था।बस फर्क इतना था की लीड रोल में प्रधान सेवक नहीं मैं था। मैंने वो वयंग बहुत से मित्रों के पास भेजा। कुछ का रिस्पांस हंसने के इमोज का आया और कुछ का गुस्से से लाल चेहरे का।कल उन लाल चेहरे भेजने वाले देश के 'सच्चे सपूतों' में से एक महानुभाव मिले,हुआ यूं की मैं घर से गाड़ी निकाल ही रहा था कि अचानक ही मेरे कानों में एक आवाज टकराई 'ओ रूक' मैंने आवाज की दिशा में देखा तो एक पुराना मित्र हाथ हिला रहा था,मैने भी हाथ हिलाया।उसने अपने कदमताल करते पैरों के स्टेयरिंग की दिशा बदल मेरी तरफ मोड़‌ दी और फुल स्पीड से मेरी तरफ बढ़ने लगे। मेरे पास आ कर गाड़ी को पार्किंग करवाने में अपने निर्देश देने लगे,"हां..हां आने दे आने दे,रोक.. अबे राईट काट और काट, हां आने दे आने दे सीधा.....लेफ्ट में घुमा थोड़ा स्टेयरिंग हां आने दे.....अबे क्या कर रहे हो यार", मैं बोला हां ठीक लग गई है मैं गाड़ी बन्द कर के बाहर आ गया।उनकी नजरें अभी भी कभी गाड़ी को और कभी रास्ते को देख रहीं थीं, उन्होंने अपना मास्क उतारा और अपने गुटखे से भरे मुख मंडल में से एक जोरदार पीक सड़क पर दे मारी।सडक की 'रग रग में रंग केसरी' भर कर और मास्क से ही अपने होंठों को साफ करते हुए बोले,"अबे लाओ बे चाबी,कैसे सड़क के बिचों बीच गाडी लगा दी है,तुम जैसे लोगो को दूसरे की तकलीफ़ से कोई मतलब नहीं होता, जहां दिल किया गाड़ी लगाई और चले गए, बाद में लोग खडे पी-पी पों-पों करते रहें,कोई गिरे पड़े तुम्हें क्या",अब रिश्ते में बड़े भाई लगते थे और थोड़े उम्र में भी बड़े थे इस लिए भाईसाहब कह इज्जत देनी पड़ती थी। मैं बोला "भाई साहब सही लगी है कोई दिक्कत नहीं",सुनते ही फट पड़े और बोले "चुप बे अबे दिक्कत तेरे को क्या होगी जो होगी दूसरों को होगी",ये कह बडबडाते हुए गाड़ी को आगे पीछे कर बापिस उसी जगह पर लगा बोले "हां अब ठीक है",बाहर आ बोले "कहां चल दिए सुबह सुबह", मैं कुछ बोलता इस से पहले ही खुद बोल पड़े ''अच्छा चल पड़े होगे काम पे और जाओगे कहां,घर से काम,काम से घर बस यही कर सकते हो तुम, मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक और साधु की दौड़ जंगल तक,अबे आज चप्पल में ही चल दिए",मैंने उनके दूसरा सवाल दागने से पहले मिले छोटे से विराम में मैंने जबाब दिया "आज छुट्टी है भाईसाहब", बोले "अच्छा छुट्टी भी करते हो", मैं हंसने लगा वो भी थोड़े मुस्कुराए,जो कि बहुत कम ही होता था। मैने भी तुरन्त उनकी तरफ सवाल उछाला मैंने कहा, "बहुत दिनों में दिखाई दिए कहा रहते हैं"।इससे पहले मैं उन महाशय जबाब बताऊं उनका संक्षेप में परिचय आप को बता दूं,वो जनाब देश के 'सच्चे सपूत' और साहब के अनन्य भक्त हैं।परन्तु नौकरी या काम कभी नहीं किया। बाप-दादाओ ने कमाके ठीक-ठाक सा किराए बगैरा का जुगाड कर दिया था, इसलिए भाई साहब की गाड़ी ठीक-ठाक सी चल रही थी, जैसे ही कोई उन्हें नौकरी या काम काज के ऊपर टोकता वो तुरन्त समाजवाद के पक्षधर बन‌‌ जाते और बहुत ही गर्व से कहते,"अबे इसे कहते हैं देश के लिए किया गया बलिदान",सामने वाला यह सुनते ही हतप्रभ रह जाता और हैरान हो पूछता, "बलिदान?वो कैसे",अब भाई साहब अपना अमोघ अस्त्र छोड़ देते‌,जिस को सुन बड़े बड़े महारथी निशब्द हो जाते और‌ ना चाहते हुए भी थोड़ी बहुत तारीफ भाई साहब की करनी पड़ती, साथ ही भाई साहब एक दो हांक देते "जब हम कालेज से निकले तो कलैक्टर आफिस में पिता जी ने फिट करवा दिया पर हम देश भक्त और क्रांतिकारीयो से प्रभावित हम किस की नौकरी करते, हमने छोड़ दी और काम धंधे के तो पूछो ही मत कितने आफर आऐ हमारे पास हमारे चाचा ने बहुत कोशिश की, फिर मामा और फूफा ने बहुत कोशिश की पर हम देश भक्त असुलों से कहां समझौता करने वाले थे,हम सब को मना करते रहे",अब दूसरा अश्चारिय चकित हो कर पूछता,"देश भक्ति कहां से आ गई इसमें",यह वो शब्द होते हैं जो भाई साहब दूसरे के मुंह सुनना चाहते हैं,वो साथ ही अपना मास्टर स्ट्रोक खेल देते वो कहते,"अबे तुम लोगों का लालच कभी खत्म नहीं हो सकता,अबे जब बाप दादाओं ने कमा लिया, अब दूसरों को भी मौका मिलना चाहिए इस लिए दूसरों के लिए हमने जगह खाली की है, तुम्हारे जैसे लालची लोगों की वजह से देश की ये हालत हो गई ‌है, गरीब और गरीब एवं अमीर और अमीर होता जा रहा है,देश के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है,तब देश बनता है नम्बर वन, तुम्हारे जैसे बस करते रहते हैं हम क्यों-हम क्यों,अबे अगर चंद्र शेखर आजाद ने या भगतसिंह ने तुम्हारी तरह कहा होता,हम क्यों-हम क्यों तो अब भी किसी अंग्रेज के घर झाड़ू-पोचा कर रहे होते,देश की व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए किसी को तो कुर्बानी देनी पड़ेगी तो क्यों ना हम ही अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखवा लें",

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