कविता शीर्षक - 'वाह रे इंसान'
" नाउम्मीदि में जी रहे सब;
हाल सभी का,एक सा हो रखा हैं...
कही सोई हैं किस्मत किसी की;
कही खुद इन्सान सो रखा हैं...
.
कोस कोस इस दुनिया को;
खुद को महान समझ बैठा...
वाह रे इन्सान;
तू खुद को भगवान समझ बैठा...
.
मेहनत तुझे करनी नहीं;
छीन कर तुझे खाना है...
फिर कोसेगा तु किस्मत को;
कितना अच्छा ये बहाना हैं...
.
ना पढ़ी गीता मैंने,ना पढ़ी कुरान है;
क्या फर्क पड़ता है,
यहाँ तो सबकी गंदी जुबान है...
झूठी तेरी शान है;
फिर कैसा तू महान हैं...
खुद को समझे भगवान तू;
तू तो ना रहा इंसान है... "
~नीरज झा
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