टीम टीमाती सी जगमग करती उसकी आँखे
कहीं अल्हड़ सी गील्ली मुस्कानशहर शहर भागी फिरू मैं
खोजू वही इश्क़ की दुकान
तलाश में उसकी कहीं खो दिया खुदको
कहीं खुद में ही यु पिरो दिया उसको
उसके साँवरें से गाल;उसके मेहक्ते बाल
इश्क़ के बाज़ार में मैं अकेली बेहालमिलने की आस में;उस ही की तलाश में
मिलने वाले को भी रोक दिया
मैंने उसको इस कदर चाहा
कि उसमें खुद को झोक दिया
सब कुछ में भूल गई
तू भी सब भुला दे
एक काम कर लौट आ
और मुझे फिरसे रुला दे
मुझे तेरे संग में रोना है
हाँ नीरज! मुझे तेरा होना है...
रोका खुदको हर बारी,तुझसे सिर्फ कहने को दूर थी
तू कोशिशे करता रहा और मैं भी कुछ मजबूर थी
मेरे नाम पर जुड़े ना जाने कितने ही नामपर एक तेरा ही नाम मुझको भाता है
मालूम है मुझे की तू कहीं ओर ही है
पर तू मुझे अभी भी चाहता है...
शायद तुझसे फिर कभी मिलना ना हो पाए
या लिखा है लकीरों में हम फिर एक हो जाए...
-नीरज झा


