"मुझे रेत पसंद है "
उसकी आज़माइशे रेत सी है;
वो रेत के किलों में दिल लगाती है;
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फिर हकीकत का एक सैलाब
सब साफ कर देता है!
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फिर वो अपने जज़्बात अपना दिल,
सब वहीं उसी किनारे छोर आती है...
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मुझे रेत पसंद है;
वो नादान रेत के किलों में दिल लगाती है!
~नीरज झा


