TITLE - "मैं कौन हूँ..."
एक खोज में हूँ;
जवाबों की चाह से परे,
कुछ सवालों के बोझ में हूँ;
आज मैं एक सवाल की खोज में हूँ...
मैं कल नही आज हूँ;
कहीं किसी बेसहारा की तो,
कहीं किसी बेजुबान की आवाज हूँ;
कहने को मैं,एक पढा लिखा समाज हूँ;
मैं हू क्या?
मैं खुद एक घिनौना सा राज हूँ ...
मैं वो हूँ जिसे ,
आइने में खुद को संवारना मंजूर हैं;
लेकिन खुद को सुधारना नहीं;
मेरी नज़र में सब बराबर है;
बस कोई छोटा, कोई काला तो नहीं;
मुझपे एक चश्मा हैं;
जिसका नाम धर्म हैं;
जिसमें सब एक है;
लेकिन सबमें मैं महान हूँ...
हाँ हाँ मैं वही हूँ;
मैं एक इंसान हूँ ....
मैंने रंग दिख के मारा है;
मैंने धर्म पूछ के मारा है;
मुझे पूछे जो सवाल किसी ने,
मैंने उसे भी मारा है;
मैंने सब कुछ फ़नाह किया;
हा हा मैं वही हूँ,
भरोसेमंद बुद्धिमान जानवर ,
इसलिए मैंने ये गुनाह किया ...
इंसानियत शर्मसार है;
हथनी तो मर गई,
जिंदा तो वो पढे लिखे गवार है;
गलती सारी उसी की थी;
भुखी थी बेचारी,
उसने था मुझसे आस किया;
हाँ हाँ मैं वही हूँ ;
जिसने है ये त्रास किया ...
सवाल मिला क्या मेरा
जो खोजने यहा आया था ...
मैं हूँ कौन?
क्या करने मैं यहा आया था...
इंसान तो रहा नहीं...
हैवान भी शर्मिंदा है...
इंसान की शक्ल में घुम रहा दरिंदा हैं....
-NEERAJ JHA


