राजा जी चले बाज़ार,
फिर से करने को प्रचार...
बाज़ार में थी जनता हज़ार,
इस बार थी वो भी त्यार...
लेकिन आगे आगे एक भक्तों की टोली चली;
अब कौन करे सवाल
भिड़े कौन इनसे, किसकी इतनी मज़ाल...
राजा जी ने फिर वादे किये;
कपड़े खोल कर धागे किये...
राजा जी ने कहा,
मुझे ही सबको बचाना था;
और जो मर गए उन को भी मिला हर्ज़ाना था...
तुम ये बिना बात क्यों चिल्लाते हो,
बताओ मुझे मुझसे क्या चाहते हो?
विपदा पड़ी देश में और भी कई भारी थी,
मैं सुन लेता सबको, मेरी इतनी कहा त्यारी थी....
कोशिश की मैंने, अब देने तुमको सब आया हूँ;
दिल खोल कर माँगो मुझसे;
मैं फिर से वादे लाया हूँ...
मैंने किये कई काम नयाब उन्हें कब किसने देखा है,
विपक्ष तू यूँही कहता मैंने व्यर्थ में पैसा फेका...
मंदिर देखो... मूर्ति देखो... देखों मेरे बंगलो को;
देश का विकास कौन दिखाया तुम जैसे कंगलो को...
उन्नति क्या जानो तुम; तुम जो सड़क पर यु सोते हो
एक मार जाए तुम्हारा, तो इतना क्यों तुम रोते हो
जीना मरना सब खेल है, उसका तुम व्यर्थ में रोये जाते हो
करके सवाल मुझसे, ना जाने तुम क्या पाते हो
ध्यान देश से ज्यादा; जो मैंने दिया चुनाव में
इसमें मेरा कोई क़सूर नहीं;
हार कर विपक्ष में रहना मुझे ये मंजूर नहीं
माना! मैने धर्म को खतरे में बता कर लड़ाया था;
पर सच बताओ उसमे लड़ने कौन आया था?
मुद्दे ये भी गंभीर थे, इसपे ज़रा विचार करो
मैं ही अकेला बचा सकता हूँ देश को,
मुझपे तुम विश्वास करो
बिगड़ते देख बोल राजा जी के भक्तों ने मोर्चा हाथ लिया,
कहा देखो इस निसान को जिनसे सदैव तुम्हारा साथ दिया!
भीड़ से एक बोला,
मेरा परिवार यहा पर खत्म हुआ;
गिनती में उनको क्यों नहीं गिनते हो?
छवि बचाने को छुपाते आकड़े,
तुम रोज़ कितना गिरते हो ?
छवि उनकी भी जरुरी है..इस देश को वो दर्शाते है;
तुम्हें क्या पता वो सिर्फ दो बार खाना खाते है...
भक्तों ने फिर यूँ शोर किया,
मुद्दा ही कहि मोड़ दिया....
-Neeraj Jha


