"खुले पर "
मुझे रिश्तों में बंदिशे पसंद नहीं
पर सुनो,
खुले पर(पंख) भी मत लाना तुम...
मुझे पसंद नहीं एहसान कोई
पर रोज मुझे एहसान जताना तुम;
मैं रोज करूंगा खुद को बयाँ
और मुझको रोज झूठलाना तुम!
बोलना मुझको पसंद नहीं अब
मुहँ मेरा मत खुलवाना तुम;
मेरी जैसे सब है यहाँ पर
तो मेरे पास मत आना तुम!
सुनो
ये फरेबी चेहरा लाना मत,
दर्द अपना सुनाना मत,
और कभी मैं जाऊ पिघल तुमपे
तो फिर से मुझको अपनाना मत
मुझे बंदिशे पसंद नहीं,
पर तुम खूले पर (पंख) भी लाना मत...
-NEERAJ JHA

