खुद को खोकर मैंने, सिर्फ ये अकड़ पाई है;
तुम्हे क्या पता कैसे, मैंने अकेले वो रात बिताई है
खुद को रोज़ खोजता, खुद को रोज़ खोता था
अकेले होने पे, मैं फुट फुट कर रोता था
बातों से ही मैंने,अपनी ये औक़ात बनाई है
खुद को खोकर मैंने, सिर्फ ये अकड़ पाई हैं
जहाँ सब थे मेरे साथ एक भीड़ में,
मैं फिर भी अकेला चल रहा था...
सबको लगती थी वो मेरी अकड़,
पर मैं अंदर ही अंदर जल रहा था...
सबकी सुन मैंने, खुद की ये धुन बनाई है
खुद को खोकर मैंने, सिर्फ ये अकड़ पाई है...
यहाँ तुम सब कहते हो मुझे; ग़ुस्सैल अभिमानी
कभी आकर पूछो मुझसे मेरे अकड़ की कहानी
मैंने तो काई बार इस्तेमाल होकर भी अपनी दोस्ती निभाई है
भरी हुई आँखे लेकर कई बार, मैंने ये सारी जनता हस्सायी है
खुद को खोकर मैंने, सिर्फ ये अकड़ पाई है
सही कहते हो तुम, मैं बहोत घमंडी अभिमानी हूँ...
तुम जाओ जाकर राम बनो,
मैं लंकापति रावण ज्ञानी हूँ...
तुम्हारे झूठे तेज़ से अच्छी,
मेरे सच्चे ज्ञान की ऊंचाई है...
और क्यों ना करुँ मैं घमंड खुद पे,
अपने तांडव से मैंने ये सारी धरती हिलाई हैं...
खुद को खोकर मैंने, सिर्फ ये अकड़ पाई हैं
नीरज झा


