कपड़ा


बचपन में देखा करती थी

बीर दीदी और गुड्डी दीदी को

कपड़े की क़तरनें तार पर सुखाते


क्या हैं यह, सोचा बहुत

पर किसी से पूछा नहीं कभी


फिर एक दिन मेरी बारी आयी

कपड़ा ढूँढने, लगाने, छुपाने की

धोया और सुखाया तो नहीं कभी

(पुराने कपड़ों की घर में कमी न थी)


पर वो गीलापन

वो दाग लगने की tension

वो बैग में extra skirt स्कूल ले जाना

दाग ना देख ले कोई लड़का

पूरा दिन घबराना


फिर आया pad का ज़माना

वो aunty की दुकान तक

पैदल चल कर जाना

और काला लिफ़ाफ़ा लेकर

छुपते-छुपाते वापस आना


पैड भी कोई नई मुसीबत

से कम थे क्या

लगा कर देखो

घंटे भर में रो पड़ोगे भैया


कभी कभी सोचती हूँ

ईश्वर क्यों देता है

इतनी छोटी उम्र में

इतनी परेशानी


जवाब मिलता है —

यह तो है स्त्री शक्ति की निशानी


हँस देती हूँ अंदर ही अंदर —

बच्चियों की परीक्षा है यह

और कुछ नहीं

सत्रह का होने तक रुक जाता

तो, हे ईश्वर, तेरा क्या जाता?


आज पैड ख़रीदने में शर्म तो नहीं आती

काला थैला दुकान पर ही छोड़ आती


पर, हे ईश्वर,

सशक्त हूँ मैं अब,

आपकी इच्छानुसार


यह शक्ति अब ले लो वापस

और कर दो मुझे आज़ाद।