हैरां हूँ.... मैं खुद पे...
कब सीख़ा.. .. तुमसे ये छिपना -छिपाना....
सभी की ख़ुशी में.... यूँ .. खुद को भुलाना...
वो आँखों में फैली... नमी को छुपाना...
वो नज़रें... चुरा के... कभी.. मुड़ के जाना,
वो... जमीं पे गिरा के... कुछ, ख़ुद ही उठाना..
वो दांतों तले.... झट से, उंगली दबाना...
और कुछ... भूल जाने का करना बहाना...
वो बे -बात... हँस के... गमों को छिपाना...
कभी... उड़ते परिंदों के... परों को गिनाना..
कभी.... आँख में कुछ गिरा है.... जताना,
कभी गुस्से में आ के... कुछ भी....बोल जाना,
और झट से.... उसी पल...गले से लगाना...
वो बातों ही बातों में....सब को हँसाना...
वो बचपन के किस्से.... कहानी... सुनाना,
सभी को हँसा... अपने... आंसू छुपाना...
तब समझी कहाँ थी...?
ये सब था... बहाना...
असल में... तो तुमको..
था... कुछ सबसे.. छुपाना.
हैरां... हूँ , सभी साथ देते थे... तेरा..
क्या पक्षी, क्या पत्ते... क्या फैला अंधेरा...
क्या बादल में छुपता... वो सुन्दर सवेरा...
क्या आँखों में.. फैले... पानी का बसेरा...
सभी ने था समझा... तुम्हारा फ़साना..
बस.... इक मैं.. न समझी तुम्हारा बहाना.
अब.....
नक़्शे कदम पे... मैं खुद, चल रही हूँ.
जो सीख़ा था... छुप के.. .वही कर रही हूँ
तेरी आदतों को... मैं.. ख़ुद में हूँ पाती,
और कमतर.... मैं ख़ुद को सदा... तोल जाती.
अभिनय तो... तेरा... मैं कर न सकूँगी...
जैसी भी हूँ... मैं तो वैसी... रहूँगी,
पर हैरां हूँ.... मुझमें कहाँ से ये आया..?
न सीख़ा था मैंने.. न तुमने सिखाया...
फिर, ये ग़ुर...कहाँ से..यूँ मुझमें समाया...
मिला ये..... विरासत में मुझको क्या तुमसे..?
अगर सच यही है.... तो खुश हूँ... मैं रब से....
तुम्हीं...से तो सीख़ा.... सदा मुस्कुराना...
यूँ.. हँसते -हँसाते... गमों को भुलाना...
तेरी सीख़... मुझको... सदा से है प्यारी,
मुस्कान सच्ची... सदा... थी तुम्हारी...
मुस्कान सच्ची... सदा थी तुम्हारी.
नीना सेठिया


