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दास्तानें जिंदगी कुछ अजब.. कुछ ला-जवाब है,
सुकूँ हर बार..नया सा...देती....बे-हिसाब है...
कोई.. मुका औ मंजिल..जब भी तय करी...मैंने,
साथ..कितनों ने दिया...वो तो..बे-मिसाल है.

मुड़ के... जब  देखती हूँ.. निशां अपने क़दमों के,
अक्स दिखतें हैं हजारों... थामें  मुझे राहों में .
हमसफर जो भी मिले...सब में कुछ अलग सी बात थी ,
किसी मेँ कशिश... किसी में सौगात..थी .
किसी ने चलना.. किसी ने संभलना सिखाया मुझको..
किसी ने प्यार से.. पलकों पे बिठाया मुझको
कोई चला.. साथ मेरे..ब-मुश्किल कटीलीं राहों पे...
किसी ने.. नाकामियों से.. उबरना सिखलाया मुझको.

कुछ बिछड़ गये... कुछ आज भी साथ हैं.
लगता है जरूर उनमें...कुछ...खास बात है.
हमसफ़र जो भी मिले... शायद
सभी की शख्सियत में...कुछ न कुछ तो..नायाब सा रहा होगा...
तभी तो..हजारों की भीड़ में... नजरों ने... सिर्फ़ उन्हें ही चुना होगा..
कुछ तो..आज भी साथ चलते हैं... हकीकत में...
कुछ की यादें.. अभी भी सिमटी हैं... सीने में.
क्या कहूँ उनके...अंदाजे-बयां के बारे में  !!!
लव्ज़ मिलते नहीं खोजती हूँ इन नजारों में.

कुछ की बातों में ही..चीनी सी इक मिठास...लगती है,
कुछ की बातें..अपना अलग ही..अंदाज़ रखतीं हैं
कोई लगता है...गज़ब का..कारीगर..
किसी के लव्जों में  है..इक अज़ब साअसर...
किसी से मिल के...सुकून मिलता है...
किसी को बार बार मिलने का दिल करता है.
किसी को मैं...कोई मुझको बांधे बैठा है..
किसी की यादों में ख़्वाबों सा मज़ा आता है.

किसी ने संवारा...किसी ने तराशा मुझको...
आहिस्ता आहिस्ता..जौहरी सा बनाया मुझको
अब शायद...किसी इंसा को पहचान लेती हूँ
बुराई न सही..अच्छाई को जान लेती हूँ
उनके किरदार को कभी...खुद में उतार लेती हूँ .
क्या कहूँ..अक्सर..उन्हीं से खुशियाँ उधार लेती हूँ

अब यही तम्मना-ए-दिल... बस..यही चाहत है...
सफ़र जिंदगी का यूँ ही चलता रहे.. रब की  रहमत है...
हमसफ़र पाक़ मिलते रहें..इतनी ही बस गुजारिश है.
नीना सेठिया