इक सुन्दर सा वृक्ष लगा है
मेरी छोटी सी बगिया में...
मन-मोहक सी छवि उसकी
हर पल बसती मेरे मन में।
परिचय का मोहताज़ नहीं वो
सौंदर्य ही परिभाषा उसकी,
ईश्वर की है अदभुत रचना
चर्चा करते हैं सब जिसकी।
पुष्प जभी भी आते उस
पर
पत्ते विलुप्त... हो जाते हैं
उनका स्वरूप दर्शाने को
अपना..सौंदर्य..छिपाते हैं।
क्या गुलमोहरऔर क्या सेमर
क्या कचनार की कलियाँ प्यारी,
सब से सुन्दर अमलतास है
शोभा जिसकी सबसे न्यारी।
ज्येष्ठ मास के आते.. ही..
कलियाँ मुखरित हो जाती हैं
और अचानक न जाने कब,
फूलों में वे ढल जातीं हैं।
पुष्प पुष्प और पुष्प ही केवल
सर्वत्र दिखाई... देते हैं,
हर आने -जाने वालों की
आखें आनंदित कर देते हैं।
क्या छवि और क्या रूप तुम्हारा
अदभुत सौंदर्य के स्वामी हो
जब भी देखूँ... पल पल सोचूं
कैसी सुन्दरतम..रचना हो।
पीठ नहीं दिखलाते. कभी तुम
क्या ईश्वर से आकार.. मिला..
इक डोरी से बंधे...सभी हो
अस्तित्व सभी का अलग सदा।
सबकी सुंदरता यूं मिल कर
इक विस्मित स्वरूप दिखाती है,
पीताम्बर ओढ़े -ओढे ही
आकर्षित सब को कर जाती है
काश!! कहीं ऐसा होता.,
जीवन अवधी लम्बी होती
खुशियाँ जो देते तुम सब को
कुछ दिन वो और अधिक होतीं...
कुछ दिन वो और अधिक होतीं....
नीना सेठिया


