माँ... जब भी तुम को याद करूँ
आ जाती हो म्रदु स्पंदन सी,
सौम्य सरल संवादों वाले
प्यारे से एक बंधन सी.
क्या भूलूँ क्या बिसराऊं मैं
क्यों कर तुमको रच पाऊँ मैं
कुछ शब्दों और संवादों से
चित्रित कैसे कर पाऊँ मैं.
तुम प्रेम मयी, तुम अर्थ मयी
आनंद मयी इक गरिमा हो
तुम सम्बल हो इस जीवन का
देवालय की सी प्रतिमा हो.
अवलोकन करते कभी कभी
आलोचक जब बन जाती हूँ,
अवचेतन मन में आकर तुम
यह बात पुनः दोहराती हो...
गुण को देखो बस, दोष नहीं
ये मूल मन्त्र है जीवन का,
शैली तो केवल रचना है
भावों के अतुल समुन्दर का.
मेरे सपनों में यदा कदा
तुम अनायास आ जाती हो,
अपनी दो निश्छल आँखों से
बिन बोले कुछ कह जाती हो.
एक मूक प्रशंसक बन कर मैं
बस तुम को ताका करती हूँ,
प्रतिबिम्ब तुम्हारा बन कर माँ
मैं खुद को आँका करती हूँ.
जब तुम थीं तब मूल्य नहीं था
तुम संग कुछ समय बिताने का,
तेरे जीवन के अनुभव से
संचित कुछ पल कर जाने का.
तुम अनायास ही चलीं गयीं
करनी थीं मुझे बहुत बातें
मन को विचलित कर जातीं हैं
अनकहीं अधूरी सी यादें.
बातें अनंत, यादें अनंत
कोई उनकी थाह नहीं मिलती
जीवन पथ के आरोहण
तुम बिन कोई राह नहीं मिलती.
बादल की धूमिल रेखाओं से
कोई चित्र कहाँ बन पाता है?
शब्दों में कैसे व्यस्त करूँ
ये जीवन भर का नाता है.
स्मृतियों की संकरी गलियों में
जब कभी पुनः मिल जाओगी,
तुम भी पल दो पल हंस लेना
मैं भी जी भर मुस्काऊँगी
नीना सेठीया
