" एहसासे-ख़ुशी "

आज सुबह-सुबह दरवाजे पे... कुछ दस्तक हुई...
खोला जो द्वार.. देखा... खड़ा था वहाँ कोई...
परिचित सी इक खनक थी... बातों से आ रही ,
और भीनी सी चमक थी.... चेहरे पे छा रही.

आलिंगन किया और पूछा.. कहाँ थीं इतने दिन...?
कटते थे रात दिन मेरे.... यूँ उदास तेरे बिन,
मुद्द्त के बाद आयी हो ... क्या तुम हो कुछ खफा...?
आया करो कभी-कभी...बिन आहट बिन सदा.

हँसने लगी... और फिर इक अदा से बोली वो...
रहती तो हूँ यहीं... कभी देखो जरा मुझको..
कल ही तो आयी थी यहाँ.. बच्चों के संग संग
खेली थी.. इस आँगन में बन रंगीन सी पतंग ,
परसों भी आयी थी... इक सखी के रूप में...
बातें करीं.. बहुत सी... और बैठे थे धूप में.

आती तो हूँ अक्सर... यहाँ..मिलने के वास्ते..
पाती हूँ.. कुछ उदास... ज्यों उलझे हों रास्ते...
अब चाहतें सभी की....कुछ बड़ी सी हों गयीं..
छोटी नहीं रहीं...बहुत बे-बाक़ हो गयीं .

चाहत तो है यही...कि सब को मिलूं यूंहीं 
पर मित्र मेरे अब...मुझे पहचानते नहीं...
उनकी उड़ान अब... बहुत ऊंचाइयो पे है
छोटे एहसास छोड़.. बस इकाइयों पे है

याद आते हैं वो दिन.. जब तितली पकड़ते थे.
छोटी सी ख़ुशी पा के भी.. सब दिल मचलते थे...
फूलों को खिलते देख सब चेहरे चमकते थे...
बारिश की पहली बूँदों पे... यूँ ही उछलते थे.

मस्ती भरी वो हरकतें... कब ख़त्म हों गयीं...
एहसासे-ख़ुशी.... शायद... उम्मीदों में खो गयी,
जीवन की आशाओं का परचम... भारी हो गया....
बे-अंत, बे-काबू  सा उड़... सपनों में खो गया.

खुशियों ने अपना दायरा... कैसे बना लिया...
छोटे पलों को... आँखों से ओझल है क्यों किया  ? 
बगिया के फूलों की तरह... चुनते चलो इन्हें...
एहसासे-ख़ुशी का... मज़ा देंगे कभी तुम्हें.

आंको तो.. हर ख़ुशी का कुछ...अपना ही मोल है..
छोटी हो या बड़ी....वो तो..अनमोल है....
छू लो उसे... हर बार बस... खुद अपने वास्ते..
खुलते रहेंगे फिर सदा...खुशियों के रास्ते...
खुलते रहेंगे फिर सदा... खुशियों के रास्ते.
                              नीना सेठिया