कुछ यादें चुम्बक सी होती हैं
भुलाना चाहो तो भी.. जुड़ी सी रहतीं हैं दिल से,
पीछा नहीं छोड़तीं कभीभी,
चाहे-अनचाहे चलती ही रहतीं हैं
साथ साथ..अपनी परछायीं सी...

वो..छोटी छोटी सी बातें..
कुछ दिल से, कुछ बेदिली से की गयीं....शरारतें , शैतानियां...
और कुछ चंचल सी हरकते..
सब आज भी..शायद साथ रहतीं हैं मेरे....

वो स्कूल का भारी सा बस्ता...
कंधे पर झूलती अध् भरी वॉटर -बौटल,
बस से उतरने के बाद... यहाँ वहाँ रुकते हुऐ घर पहुंचना..
फिर भोली सूरत से झूठ बोलना...
माँ की फटकार पर उन्हीं के आँचल से आंसू भी पोंछना,
पसंद का खाना न मिलने पर...
भुर्जी परांठे की फरमाइश करना....
और माँ से ही.. आँखें चुरा...
भाई-बहन से नाता जोड़ना...

और फिर कुछ दिन बाद..
एक नयी गलती करना....
छुप -छुप के धूप में घूमना पेड़ों पे चढ़ना, कच्चे फल तोड़ना....
कुछ खाना, कुछ
फेंकना फिर से सॉरी बोलना.....
फिर कोई नयी शरारत...
कोई नई सफाई पेश करना.....

खेल खेल में कुछ नया
भी सीखना....
और अच्छे बच्चों की तरह....
आज्ञा पालन.. भी करना,

सब संजोए बैठी हूँ दिल में,
सुबह के सपने की तरह,

कहाँ गये वो दिन... सोचती हूँ कभी,
बस इस चुम्बक... से ही तो जुड़े हैं
वो सब... आज तक...
ये न होती... तो ये मीठी यादें..
कौन रखता संजो के?
लगता है चुम्बक ने मुझे नहीं..
मैने ही बाँध रखा है उसे अपने से.....

इसी बहाने.. मुस्कुराती हूँ अक्सर...
जीती हूँ बचपन फिर से,
और हंस के धन्यवाद भी करती हूँ, चुम्बक का....
नीना सेठिया
thank you....