
होश संभालते ही जिन बंदिशों की
चादरों में लपेट दी गई तुम
आज तक उन्हीं चादरों में उसी तरह
लिपटी रही तुम।
क्यों रही मौन तुम इस तरह?
तुम क्यों चुप्पी साधी रही?
क्यों नहीं उतार फेंका तुमने बंदिशों की चादरों को?
क्या ऐसा करने की हिम्मत नहीं थी?
या किसी अनजाने डर से सहमी हुई थी
कि शायद कोई रिश्ता टूट न जाए
किसी अपनों का साथ छूट न जाए
बचपन से ही तुमने अपनी माँ से
रिश्तों की तुरपाई करना सीखा
बस तुम भी रिश्तों की तुरपाई करती
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