होश संभालते ही जिन बंदिशों की

 चादरों में लपेट दी गई तुम

आज तक उन्हीं चादरों में उसी तरह

लिपटी रही तुम।

क्यों रही मौन तुम इस तरह?

तुम क्यों चुप्पी साधी रही?

क्यों नहीं उतार फेंका तुमने बंदिशों की चादरों को?

क्या ऐसा करने की हिम्मत नहीं थी?

या किसी अनजाने डर से सहमी हुई थी

कि शायद कोई रिश्ता टूट न जाए

किसी अपनों का साथ छूट न जाए

 

बचपन से ही तुमने अपनी माँ से

रिश्तों की तुरपाई करना सीखा

बस तुम भी रिश्तों की तुरपाई करती रही

रिश्तों को सहेजती रही

अपने सपनों का चीथड़ा करती रही

अपने मन को मारती रही

रोज खुद से हारती रही


जीवन को इंद्रधनुषी रंगों से सजाना भूल गई

अपने सपनों को पंख लगाना भूल गई

भूल गई कि तुम सीता और सावित्री की

उपाधि पाकर ठगी जा रही हो

भूल गई कि तुम परफेक्शनिस्ट का तमगा

पाकर छली जा रही हो।


इधर तुम बंदिशों की चादरों को समेटती,सहेजती रही

उधर तुम्हारा 'स्व' तुमसे दूर कहीं छिटक गया।


#नीलू_चौधरी