मैं रोज टूटती हूँ,बिखरती हूँ,
खुद ही खुद को समेट लेती हूँ।
तुम्हारी ख़ामोशी मुझे भी
खामोश कर देती है।
अब तो अपनी ख़ामोशी को
शब्द में ढल जाने दो।
मुझे पढ़कर तो देखो
अल्फाज़ो से भरी हूँ मैं।
सहिष्णु धरा सदृश
अनंतकाल तक तुम्हारे बरसने का
इन्तजार करुँगी।
मुझे भरोसा है
एक दिन...
तुम्हारे पर्वत-सा कठोर
पौरुष के दर्प को
मोम सा पिघला सकूँगी
तभी तुम समझ सकोगे
मेरे जज़्बातों को।