आप पुराने वटवृक्ष सदृश थे

अटल,अडिग,छायादार

आपकी छत्रछाया में पूर्णसुरक्षित मैं

विकसित,पल्लवित हुई।

एक अनुशासित और गर्वित पिता

की छवि वाले

आपका अंतर था लबालब

माँ सदृश वात्सल्य और स्नेह से।

बच्चों के छोटे से कष्टों से भी

विचलित होने वाले पिता थे आप।

आपके रिक्त स्थानों के दर्द को

मैं रोज झेलती हूँ....

आपका पुकारना,मुझे आवाज देना...

मैं रोज ही सुनती हूँ।

जाने के बाद भी आप

नहीं खत्म कर पाए मुझसे मोह

शायद तभी...

मेरी स्मृति में हर रोज आते हैं

मेरी सलामती का आशीर्वाद

मुझे दे जाते हैं।