नाव मेरी तो फँसी मझधार है या खुदा तू ही तो अब पतवार है   क्यूँ दरारें आ गई रिश्तों में अब क्या पता किस बात पर तकरार है   मजहबी झगड़ों ने बाँटा देश को ये गुनाहों से सजी सरकार है   खून के छीटों से क्या कोई बचा लाल पूरा हो गया अखबार है   जो मैं बाहर हूँ वही भीतर भी हूँ सच बहुत उम्दा मेरा किरदार है   कीमतें बढ़ने से होता कुछ नहीं रोज ही मनता यहाँ त्योहार है