राह के पत्थर से थे बेकार तुम,
फ़र्ज़ जब समझे बने मुख़्तार तुम।
हो गए लाचार बूढ़े बाप जब,
छोड़ना उनको न यूँ बीमार तुम।
माँ तुम्हारी रोज़ सपने बुन रही,
ख़्वाहिशों के बन गए अम्बार तुम।
नफ़रतों की आग में क्यूँ घिर गए?
जबकि थे पैदाइशी अबरार तुम।
मत निभाओ दुश्मनी तुम इस तरह,
जब लुटा सकते लुटाओ प्यार तुम।
बैठ दो पल,साँस लो,सुस्ता भी लो,
यूँ न भागो,कम करो रफ़्तार तुम।
आसमां मिलता ज़मीं से रात में,
दिन भला क्यूँ बन गए दीवार तुम।
~नीलू चौधरी


