हया से नजरें झुकी हुई है,जो तेरी उल्फ़त मुझे मिली है मुराद पूरी हुई है मेरी, खुदा की रहमत मुझे मिली है   सदा मैं खिदमत में दिन गुजारूं लगे कि जैसे सजा है कोई पली हूँ नाजों पिता के घर में,ये कैसी किस्मत मुझे मिली है   सदा ही देती हूँ मान सबका,नहीं गिला है मुझे किसी से मिली पिता से ये सीख मुझको,पिता की आदत मुझे मिली है   न दूर मैं रह सकूँ तुम्हीं से,न अश्क बहना कभी रुका ये जो मेरे पहलू में आ गए तो लगे कि जन्नत मुझे मिली है   मिली है चाभी मुझे तो घर की,बहुत बड़ी मालकिन बनी हूँ लगे सजा की तरह ही सब कुछ बला की इज्ज़त मुझे मिली है