देहरी पर सदियों से खींची
लक्ष्मण रेखा को मिटा वह
बाहर आयी है
खुली हवा में साँस लेती है...
कौतुहल से देखती है
प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य को...
अनंत आकाश के नीलेपन को
अपलक निहारती है...
उगते सूर्य की लालिमा में नहाती है,
मुस्काती है
हवा के संग दौड़ते बादलों को देख
खुद दौड़ती,भागती
बचपन को याद करती है
बारिश की धार से तन-मन को
भिगोती है
चिड़ियों के संग चहचहाती है
साँझ पहर
नदी किनारे बैठ मछली को
चारा खिलाती है
जाते हुए सूर्य देव को विदा देती है वह
पुलक रहा है उसका रोम-रोम
फूट पड़ता है उसके हृदय में
काव्य-रस की धार
अपूर्व आत्मसंतुष्टि के भाव से
दीप्त हैं उसके चेहरे
लगता है...
वह जीना सीख गई है