जब मन तू-तू मैं-मैं कर लें क्या अच्छा ,

दिल में कोई गाँठ न बाँधें क्या अच्छा।


जब भी देखें बच्चे को भूले हैं गम,

ख़ुद में बच्चे ज़िन्दा कर लें क्या अच्छा ।


रोते बच्चे पल में ही मुस्काते हैं,

हम भी बचपन फिर से जी लें क्या अच्छा।


भाई-भाई बाँट रहे हैं घर को अब,

कम से कम माँ बाप न बांटें क्या अच्छा ।


इंसाँ क्यूँ भटके अब तक काशी काबा 

कण-कण में जब रब को देखें क्या अच्छा ।


~नीलू चौधरी