कहाँ गए हो मेघ तुम,भू पर पड़ी दरार नैन निहारे नभ सदा,कृषक भए लाचार।   गई सूख धरती यहाँ, कैसे पौध उगाय संकट में है जीविका,सूझे नहीं उपाय।   रहे सदा ही कष्ट में,जो जग भरता पेट खाली थाली देखकर,भूखे जाता लेट   है अकाल भारी पड़ा,कृषक हुए असहाय बचा न दाना अन्न का,पावक देह लगाय।