आज तो गुलजार ये महफिल नहीं है यूँ भी लगता अब कहीं ये दिल नहीं है   चाँद तारे रोज आते आसमां में बस झलक जाते हमें हासिल नहीं है   हारना हिम्मत नहीं दरिया से सीखो चाह दिल में हो मिलन मुश्किल नहीं है   लौट कर आओ सियासत गंदगी है ये सियासत ही तेरे काबिल नहीं है   रोज ही शव दिख रहे हैं इस शहर में अब कहें कैसे कोई कातिल नहीं है