जब हमारे बच्चे हमारे नीड़ से उड़कर खुद के नीड़ निर्माण में मगन होंगे तब हम एक दूसरे को सहारा दे रहे होंगे   जब हमारे बच्चे अपने बच्चों की किलकारियों में मगन होंगे तब हम नीरवता की चादर ओढ़े एक-दूसरे को मौन सांत्वना दे रहे होंगे   जब हमारे बच्चे अपने बच्चों के भविष्य-निर्माण में रत होंगे तब हम साहस सँजोकर अपने बुढ़ापे को संवार रहे होंगे   जब हमारे बच्चे हमें बमुश्किल झेल पा रहे होंगे उस वक्त हमारा वात्सल्य हृदय उन्हें ढेरों आशीष देने में मगन होगा।   जीवन की संध्या बेला में हम एक-दूसरे के साथी, सहचर,मार्गदर्शक और अभिवावक बनकर जीवन की इस सच्चाई को स्वीकार रहे होंगे कि हमारे बच्चे तो बस हमारे ही अतीत को दुहरा रहे हैं...