एक अकेली औरत

कुछ परेशान सी है,कुछ हैरान सी है, घर में जग जाती है, सबके जगने से पहले, लग जाती है रोज के ही कामों में कमर दर्द झेलती... घर की परिधि में घूमती,भागती, कामों को निपटाती नजर आती। पल भर देखती घड़ी की सुइयां बढ़ा देती हाथों की गति। एक ओर खड़ी होती सारे कामों को निपटा... फिर होती इनामों की बौछार - "रोटी तेरी गोल नहीं,चाय में स्वाद नहीं, सब्जी भी बेस्वाद है,दाल में हल्दी नहीं, चावल क्यूँ नरम नहीं? धुले कपड़े मैले क्यूँ? सामान यूँ फैले क्यूँ? कमरा क्यूँ सजा नहीं? होता कुछ काम नहीं, पूर्व जन्म के कर्म ऐसे घर मिले तुझे स्वर्ग जैसे" ठगी-सी वह खड़ी औरत भाग्य पर रोए या गाए?? एक अकेली हैरान औरत!