हमें वो पुराना वतन चाहिए

कि गुलज़ार फिर से चमन चाहिए।


सियासत न तू नफ़रतों को बढ़ा,

रिआया को बस अब अमन चाहिए।


दमन दुश्मनों का करेंगे यहाँ,

कि सर पे हमें भी कफ़न चाहिए।


खिलाते हमें जो जमीं चीरकर,

न माथे उन्हीं के शिकन चाहिए।


खड़े सर्द मौसम में जम जाएँगे,

करें गुफ़्तगू वो जतन चाहिए।


दिए ख़्वाब को तुम जो परवाज़ अब,

जमीं तो जमीं है गगन चाहिए।

#नीलू_चौधरी