एक स्त्री जब जाती है
घर से बाहर कुछ घंटों के लिए,
चला जाता है घर भी उसके साथ।
पसर जाता है उदास सन्नाटा घर में,
निस्तेज और निर्जीव हो जाते हैं सब,
मर जाती हैं सबकी भूख....
पर स्त्री घर लौटते ही
उदासी को बुहार कर
बाहर कर देती है घर से।
जीवंत हो जाते हैं घर के कोने-कोने...
रसोई में चुप पड़े बर्तन
बोल पड़ते हैं,
चूल्हे पर खौलती चाय की खुशबू
सबमें कर देती है
प्राण-चेतना का संचार।
तबे पर फूलती हैं रोटियाँ
तृप्त हो जाती हैं सबकी क्षुधा।
घर चलायमान है
एक स्त्री के दम पर।
गर्व से फूली स्त्री खुद को
ब्रह्मा और विष्णु के समकक्ष
खड़ी देखती है....
इसी दृष्टिभ्रम के सहारे
स्त्री जीती आ रही है सदियों से।
#नीलू_चौधरी


