यदि जनहित न पर पायी
इस धरती पर क्यूँ आयी
पशु तुल्य मेरा यह जीवन
मैं आज समझ यह पायी
सुन सकी न पीर परायी
यह जनम वृथा ही पायी
निज स्वार्थ भरा यह जीवन
परमार्थ न मैं कर पायी
यदि जनहित न कर पायी
इस धरती पर क्यूँ आयी
पाषाण हृदय है मेरा
दया उपज नहीं पायी
ईर्ष्या की घटा घिर आयी
हाय! न मैं बच पायी
धिक्कार मेरा यह जीवन
मैं इंसां न बन पायी
~नीलू चौधरी