ओ धर्म के ठेकेदारों! संस्कृति के रक्षकों! बचपन से ही किताबों में पढ़ती आयी हूँ - विविधता में एकता ही पहचान है हमारी संस्कृति की। मैं तो हर साल गौरी को रोजी के घर ईद की सेवइयां खाते देखती हूँ, तो होली के रंगों में सराबोर अब्दुल भी दिख जाते हैं। मजार पर चादर चढ़ाते हिन्दू देखे जाते हैं, तो शिव वंदन करते मुस्लिम भी दिख जाते हैं। इस एकता की जड़ को तुम कमजोर तो मत करो। भारत को भारत ही रहने दो, हमें निर्भय औ उन्मुक्त हवा में जीने दो।