मेरी आँखें नम हो जाती है शिक्षा के इस विकृत रूप को देखकर, आज शिक्षा अर्जन का ध्येय है सिर्फ सरकारी नौकर बनना ये शिक्षा मुझे ले जाती है काफी दूर... अपनी संस्कृति से, आज न तो गुरुओं में कोई द्रोण है, न शिष्यों में कोई एकलव्य, गुरु-शिष्य सम्बन्ध सिर्फ कागज़ के पन्नों पर पढ़े जाते हैं। अब तो सिर्फ विद्या बेचने और खरीदने वाले ही देखे जाते हैं।