
तुम्हारी इन दो आँखों में
देखने की हिम्मत कभी नही हुयी थी
और आज देख रहा हूँ इनमें
अपने दो अस्तित्व
यथार्थ और पलायन के मध्य
बिखरते अस्तित्व
एक जो भाग रहा हैं जीवन के सत्यो से
दूसरा जो द्दकेल रहा हैं
जीवन की जिजीविषा से झूझने को
मैं कमजोर .कायर नही
फिर भी ढूढ़ रहा हूँ
अपने होने न होने के सवाल
के हर मुमकिन जवाब को
तुम मेरी हो शोना
अरमानो का काजल लगाकर
नैनो मों सपने भर
उतर आई थी आँगन मेरे
विस्मित सी
अचंभित सी
अज्ञात में ज्ञात तलाशती
परायो में अपने
रुनझुन पायल
छनकती चूडिया
लहकती चाल
बहकती ताल
सोने के दिन थे चादी की राते
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