ऐसी कोई राह नहीं जिसमें अँधेरा ही अँधेरा हो
थोड़ा इंतज़ार करो दोस्त, शायद जल्द ही सबेरा हो
गम अक्सर अनचाहे आगंतुक की तरह आ जाते हैं
ज़रूरी तो नहीं उनका हर पल दिल में ही बसेरा हो
कितनी ही मलिन रात हो दिल को हार नहीं माननी है
स्वयं पर विश्वास रखो, तम चाहें कितना भी घनेरा हो
एक दिन जूझते क़दमों को मंजिल मिल ही जायेगी
ए दोस्त! शायद पूनम के चाँद पर पूरा हक़ तेरा हो
रस्सी पकड़कर चलते हैं हम और वो टूट भी जाती है
गाँठ लगाकर जोड़ लो दूसरा सिरा जो ऐसा टेड़ा हो
चलते-चलते अक्सर मेरे पाँव भी बहुत थक जाते थे
ऐसा वक़्त न देखा नीलम ने जिसका स्थायी डेरा हो