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शायरी तेरी मेरी

दिल तेरे दायरे से निकलता नहीं है क्यों 

आलम इसे गमों का अब खलता नहीं है क्यों ।।


क्यों झील सा ये ठहर गया है यहाँ ! ख़ुदा 

रस्तों पे ज़िंदगी के ये चलता नहीं है क्यों ।।


तन्हाई रास आने लगी क्यों इसे यहाँ

अब दे

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