शेर लिख लिख के अपनी उम्र ये गुज़ार दी.
आशिक़ी शायरी में थी, ज़िन्दगी बेज़ार थी.
दर्द दिल में रहा, स्याही ना बन पाया.
कोरे काग़ज़ पे, हालेदिल न बयाँ करना आया.
लिखते लिखते ना हो जाए, ज़िन्दगी ये तमाम,
दो लफ़्ज़ अब साथ मेरे, साक़ी और जाम.
-आफरीन शेख़ /@AfrinNazsm
