ना फूल में, ना रंग में, ना बहार, ना चमन में था,

मैं ढूँढती चारों तरफ़, मेरा घर बाघ-ए-गुलशन में था.

खोगया था दिल प्यार में, जो था मेरे इख़्तियार में,

था दर्द, थे फासले, पर था मज़ा इंतज़ार में.

अब जो हूआ तू बेवफ़ा, ये ज़िन्दगी है बेमज़ा,

हुए हम बड़े बेआबरू, तेरा प्यार बनगया सज़ा.

अब है सिया ये दिन मेरे, मेरी अँधेरी रात है,

है खोखले जज़्बात, बेजान एहसासात है.

अब फिर ना होगा इश्क़, जो ये हो गया इक बार है,

अब दयार-ए-दिल में है शुबा, ना किसी पे ऐतबार है.

- आफरीन शेख़ /@AfrinNazms