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फिर क्यों फकीर सा इंसान लगता है

कहने को तो मै हूँ तुम हो सब कुछ है फिर क्यों खाली सा मकान लगता है अपनी जगह सोफा मेज़ वक़्त लिए है फिर क्यों बिखरा सा सामान लगता है खिलती है धूप रोज़ खुशबू बिखरती है फिर क्यों खाली सा रेगिस्ता
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