कहने को तो मै हूँ तुम हो सब कुछ है फिर क्यों खाली सा मकान लगता है अपनी जगह सोफा मेज़ वक़्त लिए है फिर क्यों बिखरा सा सामान लगता है खिलती है धूप रोज़ खुशबू बिखरती है फिर क्यों खाली सा रेगिस्तान लगता है इश्क़ की दौलत मिली सबको है फिर क्यों फकीर सा इंसान लगता है सदियो से बसा दिल मे तू है फिर क्यों अधूरा सा अरमान लगता है चाँद आता है सूरज भी खिलता है फिर क्यों सूना सा जहान लगता है