कल रात तमाम शहर बारिश में नहाया है पर सबको मैं ही ख़ुश्क नज़र आया हूँ उतर गए है सबके रंग दिखे कई चेहरे नए है पर सबको मैं ही क़ातिल नज़र आया हूँ मंदिरो में पूजा मज़्ज़िदो में नमाज़ की है पर सबको मैं ही काफ़िर नज़र आया हूँ इश्क़ ने सबको ठगा जुर्म सभी ने किया है पर सबको मैं ही मुज़रिम नज़र आया हूँ चाहे उलझने कितनी ही मुझे खुद घेरे है पर सबको मैं ही हातिम नज़र आया हूँ ज़िन्दगी ज़ख़्म बिना कहा बिताई है पर सबको मैं ही हक़ीम नज़र आया हूँ