खिलता था सूरज, चहकते थे पंछी
लहलहाती थी फसले, नाचते थे मोर
बच्चे थे बागीचों में, होते थे दिनभर शोर
निकलते थे सैर पर, बूढ़े बच्चे होते भोर
नदियाँ कल कल करती, बहती थी हरओर
साँझ को मिलते थे गले, धरा सूरज बनाकर छोर
आते थे बादल, बड़ी दूर से नया मौसम लेकर
बरसते थे, गरजते थे, जग में चारो ओर
न जाने कहा से ये कड़बी हवा आई है
चारो ओर हम पर छाई है
अब रह गये है दो मौसम
हर तरफ खाने पानी को दुहाई है
रोको इस धुँए को रोको इन शहरो को
वरना इंसानी क़ौम पर शामत आई है