मेरे बचपन की कुछ बाते कुछ कहानी,
वो गुल्ली-डंडा, सितोलिया,बर्फ-पानी...
वो पापा के कंधे से देखे मेले,
मम्मी ने सिखाई बाते सयानी...
चलती थी दूर तक कागज़ की नाव मेरी,
जब भी बरसता था सावन का पानी...
कभी झूले पेड़ो पर झूले,
कभी चलाई साईकल पुरानी...
करता था त्योहारों का इंतज़ार,
ताकि करू मैं खूब शैतानी...
कभी आना फिर सुनाऊँगा कुछ और,
मेरे बचपन की कुछ बाते कुछ कहानी...