किताब में लिखा किरदार हूँ श्रम बेचता एक दुकानदार हूँ है मेरे कितने रूप नही जानता पर मैं अपने लिए वफ़ादार हूँ जीते जी हर कर्ज़ उतारना है मैं इस देह में किराएदार हूँ है सन्नाटे गूँजते मेरे कानों में मैं ख़ुद में खुला सभागार हूँ #अभिषेक_मंडलोई