एक मुसाफ़िर अपने सफ़र से यू दूर हुआ जो देखा अपने बच्चो को तो मजबूर हुआ थक हार कर बैठ गया वापस अपनी कुर्सी पर ऐसे कोई शक़्स अपने खाबो से दूर हुआ अब तो बस एक उम्र घेरे है मुझे बुढ़ापे की की अब मेरे आँखों से हर रंग बेनूर हुआ आने को है मेरी मौत अपना लिवाज़ पहने दोस्तों चलता हूँ अब मैं अपनी कब्र का हुआ