आकाश मैंने तुमसे न तुम्हारी ऊँचाई माँगी थी, न तुम्हारा विस्तार मैंने सिर्फ़ तुम्हारे एक छोटे-से टुकड़े के नीचे माँगी थी, अपने सर के नीचे एक छत धरती मैंने तुमसे न तुम्हारी गरिमा माँगी थी, न तुम्हारा धैर्य मैंने माँगा था- दो ग़ज़ ज़मीन का एक टुकड़ा और तुम्हारे भीतर उतनी ही बड़ी एक क़ब्रगाह हवा मैंने तुमसे तुम्हारी शोख़ियाँ कहाँ माँगी थी? हाँ, तेरा दम न घुटे, बस इतना ही तो माँगा था नदी! कब कहा था मैंने कि रुक जाओ मेरे लिए हाँ, अँजुरी भर पानी ज़रूर माँगा था अपनी प्यास के लिए ओ तितली! तेरे रंग कब चुराने चाहे मैंने लेकिन मेरा जीवन बदरंग न हो क्या यह सोचना भी गुनाह था? अपने लिए ज़रुरत से ज़्यादा बटोरने का तो स्वप्न भी नहीं देखा कभी तब— आज तुम सबसे जवाब माँगता हूँ ओ आकाश, ओ धरती, ओ नदी, ओ हवा, ओ तितली! ज़रुरत भर भी छत, ज़मीन का टुकड़ा, साँस भर हवा, प्यास भर पानी और बस ज़रा-सा रंग तमाम उम्र क्यों न मिला?