मासूमियत बिकती नहीं बाजारों में,अब बात कहां है मोहब्बत वाली,उन खंडहर खाली मीनारों में,यूं दीवारों पर लिखने से मोहब्बत,अमर हुआ नहीं करती ग़ालिब,उम्र लग जाती है मोहब्बत निभाने में.....
मासूमियत बिकती नहीं बाजारों में,अब बात कहां है मोहब्बत वाली,
उन खंडहर खाली मीनारों में,यूं दीवारों पर लिखने से मोहब्बत,
अमर हुआ नहीं करती ग़ालिब,उम्र लग जाती है मोहब्बत निभाने में.....